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आरक्षण व्यवस्था का मर्म और दिल्ली की सड़कों पर सुलगती बहस: इतिहास से वर्तमान तक

मीडिया 100 डेस्क 04 Sep 2026 50 Views 5 min read दिल्ली
आरक्षण व्यवस्था का मर्म और दिल्ली की सड़कों पर सुलगती बहस: इतिहास से वर्तमान तक
आरक्षण व्यवस्था का मर्म और दिल्ली की सड़कों पर सुलगती बहस: इतिहास से वर्तमान तक
यह खबर दिल्ली के जंतर-मंतर पर सुलग रहे 'आरक्षण सुधार आंदोलन' और देश में आरक्षण व्यवस्था के पूरे ऐतिहासिक सफर पर केंद्रित है। इसमें संविधान निर्माण और मंडल आयोग से लेकर आधुनिक समय (2019 के EWS संशोधन) तक के पड़ावों का लेखा-जोखा है। साथ ही, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों—जैसे जाति के स्थान पर आर्थिक आधार, 'वन फैमिली, वन कोटा' (एक परिवार, एक आरक्षण) का नियम, और प्रशासनिक पारदर्शिता—को रेखांकित करते हुए इसके सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं का गहराई से विश्लेषण किया गया है।

जब देश स्वतंत्र हुआ और संविधान का ताना-बाना बुना जा रहा था, तब बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता सदियों से प्रताड़ित, शोषित और हाशिए पर धकेल दिए गए वर्गों को राष्ट्र की मुख्यधारा में समान रूप से शामिल करने की थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेदों ने राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों, अनुसूचित जातियों (SC) तथा अनुसूचित जनजातियों (ST) के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान और उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का अधिकार दिया।

​शुरुआती दौर में इस नीति को एक निश्चित संवेदनशीलता और सीमित दायरे के साथ देखा गया था, परंतु सामाजिक असमानता की जड़ें इतनी गहरी थीं कि समय के साथ इसका दायरा विस्तृत होता चला गया।

  • काका कालेलकर आयोग (1953): यह देश का सबसे पहला पिछड़ा वर्ग आयोग था, जिसने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की पहचान और उनकी स्थिति को ऊपर उठाने के लिए कई अहम सुझाव दिए थे, हालांकि उस दौरान इन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया गया।
  • मंडल आयोग (1979): बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में गठित इस आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें ओबीसी वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की संस्तुति की गई।
  • नब्बे का दशक और राजनीतिक संघर्ष: प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में जब मंडल आयोग की सिफारिशों को जमीन पर उतारा गया, तो पूरे देश में एक तीखा वैचारिक और सामाजिक बवंडर खड़ा हो गया। उस दौर के छात्र आंदोलनों ने भारतीय राजनीतिक दलों के समीकरणों और सामाजिक ताने-बाने को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।
  • इंदिरा साहनी मामला (1992): सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय कर दी और 'क्रीमी लेयर' यानी संपन्न वर्ग को इससे बाहर रखने का नियम अनिवार्य किया ताकि इसका लाभ केवल वास्तविक जरूरतमंदों तक ही पहुंचे।

​हालिया संवैधानिक बदलाव और नए आयाम

​बीते कुछ वर्षों में आरक्षण के दायरे में कई बड़े फेरबदल देखने को मिले हैं। वर्ष 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत कोटे का प्रावधान जोड़ा गया, जिसने पहली बार जातिगत पहचान के साथ-साथ विशुद्ध आर्थिक आधार को भी आधिकारिक मान्यता दी। इसके अलावा, अदालतों द्वारा उप-वर्गीकरण (Sub-classification) पर दिए गए फैसलों ने इस बात पर नई बहस छेड़ दी है कि क्या आरक्षित श्रेणियों के भीतर भी सबसे ज्यादा उपेक्षित और निचले पायदान पर खड़े लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

​दिल्ली के मैदानों में सुलगता नया आक्रोश

​इन तमाम ऐतिहासिक और कानूनी पड़ावों के बीच, वर्तमान समय में दिल्ली की फिज़ा एक बिल्कुल नए और आक्रामक आंदोलन से गरमाई हुई है। जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पर 'आरक्षण सुधार आंदोलन' के बैनर तले इकट्ठा हुए युवाओं का गुस्सा इस व्यवस्था के कई पहलुओं पर सवाल खड़े कर रहा है।

​इस नए आंदोलन के मुख्य तर्क और मांगें इन बिंदुओं पर टिकी हैं:

  • जाति के स्थान पर आर्थिक पैमाना: प्रदर्शनकारियों का मुख्य तर्क है कि सरकारी सहायता या आरक्षण का आधार किसी की जाति या सरनेम नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति होनी चाहिए, ताकि हर गरीब परिवार को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले।
  • 'वन फैमिली, वन कोटा' का नियम: इस आंदोलन का एक सबसे तीखा सवाल यह है कि आरक्षित श्रेणियों के भीतर जो परिवार या घराने एक बार आर्थिक रूप से संपन्न हो चुके हैं, उनके बच्चे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका लाभ क्यों उठाते रहें? इससे उसी वर्ग के दूरदराज गांवों में बैठे सचमुच गरीब लोग पीछे छूट जाते हैं।
  • प्रशासनिक और पारदर्शी समीक्षा: आंदोलन से जुड़े युवा यूजीसी के दिशा-निर्देशों, मौजूदा अधिनियमों और प्रशासनिक नीतियों के निष्पक्ष और पारदर्शी ऑडिट की मांग कर रहे हैं।

​दूसरी ओर, समाजशास्त्रियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इस आंदोलन के विपरीत चेतावनी देता है। उनका मानना है कि यदि बिना सोचे-समझे इस सामाजिक सुरक्षा कवच को कमजोर किया गया, तो इसका सबसे बुरा प्रभाव उन समुदायों और महिलाओं पर पड़ेगा जिन्हें इतिहास में शिक्षा और अधिकारों से वंचित रखा गया था। उनका यह भी कहना है कि भारतीय समाज के जटिल पारिवारिक और सामाजिक ढांचे में केवल कागजी आंकड़ों को आधार बनाना जमीनी हकीकत से न्याय नहीं होगा।

​आरक्षण की यह पूरी दास्तान केवल आंकड़ों, प्रतिशत या नौकरियों का साधारण सवाल नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान, सामाजिक भागीदारी और राष्ट्र निर्माण की मूल आकांक्षाओं से जुड़ी एक लंबी दास्तान है। एक तरफ जहां युवा पीढ़ी पुरानी व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता, निष्पक्षता और योग्यता आधारित न्याय की मांग कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐतिहासिक सामाजिक दूरियों को पाटने के लिए सुरक्षात्मक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी माना जा रहा है। जब तक नीति-निर्माता और समाज के सभी वर्ग इस पेचीदगियों को बिना किसी पूर्वाग्रह के नहीं समझेंगे, तब तक देश की राजधानियों और सड़कों से उठने वाली ये आवाजें नीतिगत गलियारों को झकझोरती रहेंगी।

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